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shiva, parvati, and ravan
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कैसे पड़ा दशानन का नाम रावण | kaise pada Dashaanan ka naam Raavan




कैसे पड़ा दशानन का नाम रावण | kaise pada Dashaanan ka naam Raavan

विश्रवा की सलाह पर कुबेर ने लंका त्याग दिया और हिमाचल (hiachal) चले गए. इससे दशानन बहुत प्रसन्न हुआ और लंका का राजा (king of lanka) बन बैठा. उसने साधुजनों पर अनेक अत्याचार करने शुरू कर दिए. इसकी ख़बर जब कुबेर को लगी तो उन्होंने अपने भाई को समझाने के लिए अपना एक दूत लंका भेजा. दूत ने दशानन को प्रणाम करते हुए कुबेर का संदेश सुनाया और यह भी कहा कि भ्राता ने आपको सत्य पथ पर चलने को कहा है. इससे दशानन बौखला गया और उसने दूत को बंदी बना लेने का आदेश दे दिया. दूत के बंदी बनते ही रावण ने अपनी खड्ग (sword) निकाली और दूत के शरीर के दो टुकड़े कर दिए. इसके तुरंत बाद वो अपनी सेना लेकर कुबेर की नगरी अलकापुरी को जीतने निकल पड़ा. वहाँ पहुँचकर दशानन और उसके सेनापतियों ने कुबेर की सेना को गाजर-मूली की तरह काट दिया. दशानन ने अपने भाई कुबेर पर गदा से प्रहार कर उसे घायल (injured) कर दिया लेकिन उसके सेनापतियों ने किसी तरह उसे नंदनवन पहुँचा दिया जहाँ वैद्यों ने उसका इलाज (treatment) कर उसे ठीक कर दिया.

अब दशानन का उत्साह चरम (excitement on top) पर पहुँच चुका था. इसी उत्साह में वह शारवन की तरफ चल पड़ा. एक पर्वत (mountain) के पास से गुजरते हुए उसके पुष्पक विमान की गति स्वयं ही धीमी हो गई. दशानन को यह समझ ही नहीं आ रहा था कि चालक की इच्छानुसार चलने वाले विमान की गति अचानक से स्वयं ही कैसे धीमी हो गई. तभी दशानन की दृष्टि सामने की ओर गई जहाँ उसे विशाल और काले शरीर वाले नंदीश्वर खड़े मिले. नंदीश्वर ने दशानन को चेताया कि,’यहाँ भगवान शंकर क्रीड़ा में मग्न हैं इसलिए तुम लौट जाओ.’ इस पर दशानन ने दंभ से कहा कि कौन है ये शंकर और किस अधिकार से वह यहाँ क्रीड़ा करता है?  मैं उस पर्वत का नामो-निशान मिटा दूँगा जिसने मेरे विमान (plane) की गति अवरूद्ध की है.’ इतना कहते ही उसने पर्वत की नींव पर हाथ लगाकर उसे उठाना चाहा. अचानक इस विघ्न से शंकर भगवान (bhagwan shri shankar ji) विचलित हो गए.  भगवान शंकर ने वहीं बैठे-बैठे पाँव के अंगूठे से पर्वत को दबाया तो मजबूत खंभे जैसी दशानन की बाँहें पर्वत के नीचे दब गई. क्रोध और दर्द से दशानन राव(आर्तनाद) कर उठा जिससे तीनों लोक काँप उठे. सभी को ऐसा लगा जैसे प्रलयकाल निकट आ गया है. तब दशानन के मंत्रियों ने उसे शिव के स्तुति की सलाह दी. दशानन ने बिना देरी किये सामवेद में उल्लेखित शिव के सभी स्तोत्रों का गान शुरू कर दिया. अंत में भगवान शिव ने प्रसन्न (happy) होकर दशानन को माफ करते हुए उसकी बाँहों को मुक्त कर दिया. भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसका नाम रावण रख दिया. तब से दशानन को रावण के नाम से जाना जाने लगा. शिव की स्तुति में रचा गया वह स्त्रोत आज भी ‘रावण-स्त्रोत’ के नाम से लोकप्रिय हुआ.

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