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जानिए भगवान गणेश के प्रतीक चिन्हों का पौराणिक रहस्य – shri bhagwan shri ganesh ji ke prateek chinho ka pauranik rahasya




जानिए भगवान गणेश के प्रतीक चिन्हों का पौराणिक रहस्य- shri bhagwan shri ganesh ji ke prateek chinho ka pauranik rahasya

गणेश जी (shri ganesh ji) को ऋद्धि-सिद्धि का दाता कहा जाता है. गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है. देवी-देवताओं में प्यारे गणेश जी का मस्तक तो हाथी (elephant head) का है लेकिन वह सवारी नन्हे मूषक (mouse) की करते हैं. खाने को उन्हें चाहिए गोल-गोल लड्डू. उनकी आकृति चित्रकारों की कूची को बेहद प्रिय रही है और उनकी बुद्धिमत्ता का लोहा ब्रह्मादि सहित सभी देवताओं ने माना है. उनके विचित्र रूप को लेकर उनके भक्तों में जिज्ञासा रहती है. आइए इन जिज्ञासाओं को दूर करते हैं.

भगवान गणेश की पहले पूजा क्यों की जाती है

कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा (pooja/prayer) जरूर की जाती है. इस तरह की स्थिति को हम ‘श्रीगणेश’ के नाम से भी जानते हैं. अब मन में सवाल (question) उठता है कि आखिर क्यों भगवान श्री गणेश की पूजा अन्य देवताओं से पहले की जाती है.

पहली कथा

गणेश जी की प्रथम पूजा के संबंध में कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं. जब भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काटा तो उस समय पार्वती बहुत क्रोधित हुईं. गज का सिर लगाने के बाद भी जब वह शिव से रूठी रहीं तो शिव ने उन्हें वचन (promise) दिया कि उनका पुत्र गणेश कुरूप नहीं कहलाएगा बल्कि उसकी पूजा सभी देवताओं से पहले की जाएगी. इसलिए कोई भी कार्य शुरू करने से पहले हम ॐ गणेशाय नमः कहते हैं.

दूसरी कथा

एक अन्य कथा के अनुसार एक बार सभी देवताओं में पहले पूजे जाने को लेकर विवाद छिड़ गया. आपसी झगड़ा (fight/argument) सुलझाने के लिए वे भगवान विष्णु (bhagwan vishnu ji) के पास गए. विष्णु जी सभी देवताओं को लेकर महेश्वर शिव के पास गए. शिव ने यह शर्त रखी कि जो पूरे विश्व की परिक्रमा करके सबसे पहले यहां पहुंचेगा वही श्रेष्ठ होगा और उसी की पूजा सर्वप्रथम होगी. शर्त सुनते ही सभी देवता शीघ्रता से अपने-अपने वाहनों में बैठ विश्व की परिक्रमा के लिए प्रस्थान कर गए लेकिन गणेश जी ने बुद्धि चातुर्य का प्रयोग किया और अपने माता-पिता (mother father) से एक साथ बैठने का अनुरोध किया. गणेश जी माता (पृथ्वी) और पिता (आकाश) की परिक्रमा करने के बाद सर्वश्रेष्ठ पूजन के अधिकारी बन गए.

ओ३म् (ॐ) में गणेश

शिवमानस पूजा में श्री गणेश को ओ३म् (ॐ) या ओंकार का नामांतर प्रणव कहा गया है. इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूंड मानी गई है.

गणेश ने मूषक को क्यों चुना अपना वाहन

पौराणिक कथा

प्राचीन समय में सुमेरू अथवा महामेरू पर्वत (mountain) पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था. उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था. एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन (jungle/forest) में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई. उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहां आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया. अपनी व्याकुलता में कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया. रोती और कांपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख (begging) मांगने लगी. उसी समय सौभरि ऋषि आ गए. उन्होंने कौंच को श्राप देते हुए कहा ‘तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा. कांपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की -’दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था, मुझे क्षमा कर दें’. ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान (respect) करने लगेंगे.

बुद्धि के देवता

भगवान गणेश जी ने आखिर निकृष्ट माने जाने वाले मूषक (चूहा) जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना? गणेश जी की बुद्धि का हर कोई कायल है. तर्क-वितर्क में हर कोई हार (loose) जाता था. एक-एक बात या समस्या की तह में जाना, उसकी मीमांसा करना और उसके निष्कर्ष तक पहुंचना उनका शौक है. चूहा भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं रहता. चूहे का काम किसी भी चीज को कुतर डालना है, जो भी वस्तु चूहे को नजर आती है वह उसकी चीरफाड़ कर उसके अंग प्रत्यंग का विश्लेषण सा कर देता है. शायद गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना होगा.

मोदक का भोग

शास्त्रों के मतानुसार भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए सबसे सरल व उत्तम उपाय है मोदक का भोग. गणेश जी को सबसे प्रिय मोदक है. गणेश जी का मोदक प्रिय होना भी उनकी बुद्धिमानी का परिचय है.

मोदक का अर्थ- मोद’ यानी आनंद व ‘क’ का अर्थ है छोटा-सा भाग. अतः मोदक यानी आनंद का छोटा-सा भाग. मोदक का आकार नारियल (coconut) समान, यानी ‘ख’ नामक ब्रह्मरंध्र के खोल जैसा होता है. कुंडलिनी के ‘ख’ तक पहुंचने पर आनंद की अनुभूति होती है. हाथ में रखे मोदक का अर्थ है कि उस हाथ में आनंद प्रदान करने की शक्ति है.

यही नहीं मोदक ज्ञान का प्रतीक (symbol of knowledge) भी है. जैसे मोदक को थोड़ा-थोड़ा और धीरे-धीरे खाने पर उसके स्वाद और मिठास (sweetness) का पता चलता है और अंत में उसे खाने के बाद हमे आनंद प्राप्त होता है, उसी तरह ज्ञानमोदक को लेकर आरंभ में लगता है कि ज्ञान थोड़ा सा ही है परंतु अभ्यास आरंभ करने पर समझ आता है कि ज्ञान अथाह है.

क्या है गणेश जी की सूंड

गणेश जी की सूंड को लेकर ऐसी मान्यता है कि सूंड को देखकर दुष्ट शक्तियां डरकर मार्ग से अलग हो जाती हैं. इस सूंड के जरिए गणेश जी ब्रह्मा जी पर कभी जल फेंकते हैं तो कभी फूल (flower) बरसाते हैं. गणेश जी की सूंड के दायीं ओर या बायीं ओर होने का भी अपना महत्व है. कहा जाता है कि सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए उनकी दायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए और यदि किसी शत्रु पर विजय (win on enemy) प्राप्त करने जाना हो तो बायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए.

क्यों कहा जाता है लंबोदर

लड्डू प्रेमी भगवान गणेश जी का पेट बहुत बड़ा (big stomach) है इसलिए उन्हें लंबोदर भी कहा जाता है. लेकिन लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर उनका नाम लंबोदर कैसे पड़ा. ब्रह्मपुराण में वर्णन मिलता है कि गणेश जी माता पार्वती का दूध दिन भर पीते रहते थे. उन्हें डर था कि कहीं भैया कार्तिकेय आकर दूध न पी लें. उनकी इस प्रवृति को देखकर पिता शंकर ने एक दिन विनोद में कह दिया कि तुम दूध बहुत पीते हो कहीं तुम लंबोदर न बन जाओ. बस इसी दिन से गणेश जी का नाम लंबोदर पड़ गया. उनके लंबोदर होने के पीछे एक कारण यह भी माना जाता है कि वे हर अच्छी-बुरी बात को पचा (digest) जाते हैं.

गणेश के अन्य अंग

हाथी जैसा सिर होने के कारण गणेश भगवान को गजानन भी कहते हैं. उनके बड़े कान ग्राह्यशक्ति की सूचक हैं अर्थात इसका मतलब है कि हमें कान का कच्चा नहीं सच्चा होना चाहिए. कान से सुनें सभी की, लेकिन उतारें मन में सत्य को. वहीं उनकी छोटी-पैनी आंखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं अर्थात सूक्ष्म आंखें जीवन में सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं. जबकि उनके नाक (nose) के होने का मतलब है किसी भी दुर्गन्ध (विपदा- problem) को दूर से ही पहचान सकें. गणेशजी के दो दांत हैं एक अखण्ड और दूसरा खण्डित. अखण्ड दांत श्रद्धा का प्रतीक है यानि श्रद्धा हमेशा बनाए रखना चाहिए. खण्डित दांत है बुद्धि का प्रतीक, इसका तात्पर्य है कि एक बार बुद्धि भ्रमित हो, लेकिन श्रद्धा न डगमगाए.

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