Home » Gyan » जानिये क्या होता है ध्यान से? और क्यों करना चाहिए ध्यान | Jaaniye kya hota hai dhyaan se? aur kyon karna chahiye dhyan.
जानिये क्या होता है ध्यान से? और क्यों करना चाहिए ध्यान | Jaaniye kya hota hai dhyaan se? aur kyon karna chahiye dhyan.
जानिये क्या होता है ध्यान से? और क्यों करना चाहिए ध्यान | Jaaniye kya hota hai dhyaan se? aur kyon karna chahiye dhyan.

जानिये क्या होता है ध्यान से? और क्यों करना चाहिए ध्यान | Jaaniye kya hota hai dhyaan se? aur kyon karna chahiye dhyan.




जानिये क्या होता है ध्यान से? और क्यों करना चाहिए ध्यान | Jaaniye kya hota hai dhyaan se? aur kyon karna chahiye dhyan.

सवाल (question) पूछा जा सकता है कि क्या होता है ध्यान से? ध्यान (concentration) क्यों करें? आप यदि सोना बंद कर दें तो क्या होगा? नींद आपको फिर से जिंदा करती है। उसी तरह ध्यान आपको इस विराट ब्रह्मांड के प्रति सजग करता है। वह आपके आसपास की उर्जा (energy) को बढ़ाता है कहना चाहिए की आपकी रोशनी (light) को बढ़ाकर आपको आपकी होने की स्थिति से अवगत कराता है। अन्यथा लोगों को मरते दम तक भी यह ध्यान नहीं रहता कि वे जिंदा (alive) भी थे।

ध्यान से व्यक्ति को बेहतर समझने और देखने की शक्ति (power) मिलती है। साक्षी भाव में रहकर ही आप स्ट्रांग (strong) बन सकते हो। यह आपके शरीर, मन और आपके (आत्मा- soul) के बीच लयात्मक संबंध (relation) बनाता है। दूसरों की अपेक्षा आपके देखने और सोचने का दृष्टिकोण एकदम अलग होगा है। ज्यादातर लोग पशु स्तर पर ही सोचते, समझते और भाव करते हैं। उनमें और पशु (animal) में कोई खास फर्क नहीं रहता।

बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी गुस्से (anger) से भरा, ईर्ष्या, लालच, झूठ और कामुकता (lust) से भरा हो सकता है। लेकिन ध्यानी व्यक्ति ही सही मायने में यम और नियम को साध लेता है।

इसके अलावा ध्यान योग का महत्वपूर्ण (important) तत्व है जो तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है। ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केन्द्रित होती है। उर्जा केन्द्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल बढ़ता है। ध्यान से वर्तमान (present) को देखने और समझने में मदद मिलती है। वर्तमान में हमारे सामने जो लक्ष्य (target) है उसे प्राप्त करने की प्रेरण और क्षमता भी ध्यान से प्राप्त होता है।

आप मंदिर, मस्जिद, चर्च (church) या गुरुद्वारे में वह नहीं पा सकते जो ध्यान आपको दे सकता है। ध्यान ही धर्म का सत्य है बाकी सभी तर्क और दर्शन की बाते हैं जो सत्य नहीं भी हो सकती है। सभी महान लोगों ने ध्यान से ही सब कुछ पाया है।

मूलत: ध्यान को चार भागों में बांटा जा सकता है-

1.देखना, 2.सुनना, 3.श्वास लेना और 4.आंखें बंदकर मौन होकर सोच पर ध्‍यान देना। देखने को दृष्टा या साक्षी ध्यान, सुनने को श्रवण ध्यान, श्वास लेने को प्राणायाम ध्यान और आंखें बंदकर सोच पर ध्यान देने को भृकुटी ध्यान कह सकते हैं। उक्त चार तरह के ध्यान के हजारों उप प्रकार (thousand types) हो सकते हैं।

उक्त चारों तरह का ध्यान आप लेटकर, बैठकर, खड़े रहकर और चलते-चलते भी कर सकते हैं। उक्त तरीकों को में ही ढलकर योग और हिन्दू धर्म (hindu dharam) में ध्यान के हजारों प्रकार बताएं गए हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा अनुसार हैं। भगवान शंकर (bhagwan shri shankar ji) ने मां पार्वती (maa parvati ji) को ध्यान के 112 प्रकार बताए थे जो ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ में संग्रहित हैं।

देखना : ऐसे लाखों लोग हैं जो देखकर ही सिद्धि तथा मोक्ष के मार्ग (way) चले गए। इसे दृष्टा भाव या साक्षी भाव में ठहरना कहते हैं। आप देखते जरूर हैं, लेकिन वर्तमान में नहीं देख पाते हैं। आपके ढेर सारे विचार, तनाव (stress) और कल्पना (thoughts) आपको वर्तमान से काटकर रखते हैं। बोधपूर्वक अर्थात होशपूर्वक वर्तमान को देखना और समझना (सोचना नहीं) ही साक्षी या दृष्टा ध्यान है।

सुनना : सुनकर श्रवण बनने वाले बहुत है। कहते हैं कि सुनकर (listen) ही सुन्नत नसीब हुई। सुनना बहुत कठीन (difficult) है। सुने ध्यान पूर्वक पास और दूर से आने वाली आवाजें। आंख (eyes) और कान (ears) बंदकर सुने भीतर से उत्पन्न होने वाली आवाजें। जब यह सुनना गहरा (deep) होता जाता है तब धीरे-धीरे सुनाई देने लगता है- नाद। अर्थात ॐ का स्वर।

श्वास पर ध्यान : बंद आंखों से भीतर और बाहर गहरी सांस (deep breath) लें, बलपूर्वक दबाब डाले बिना यथासंभव गहरी सांस लें, आती-जाती सांस के प्रति होशपूर्ण और सजग रहे। बस यही प्राणायाम ध्यान की सरलतम और प्राथमिक विधि है।

भृकुटी ध्यान : आंखें बंद करके दोनों भोओं के बीच स्थित भृकुटी पर ध्यान लगाकर पूर्णत: बाहर और भीतर से मौन रहकर भीतरी शांति (inner calm) का अनुभव करना। होशपूर्वक अंधकार (darkness) को देखते रहना ही भृकुटी ध्यान है। कुछ दिनों बाद इसी अंधकार में से ज्योति का प्रकटन होता है। पहले काली, फिर पीली और बाद में सफेद होती हुई नीली।

अब हम ध्यान के पारंपरिक प्रकार की बात करते हैं। यह ध्यान तीन प्रकार का होता है- 1.स्थूल ध्यान, 2.ज्योतिर्ध्यान और 3.सूक्ष्म ध्यान।

1.स्थूल ध्यान- स्थूल चीजों के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते हैं- जैसे सिद्धासन में बैठकर आंख बंदकर किसी देवता, मूर्ति, प्रकृति या शरीर के भीतर (inside the body) स्थित हृदय चक्र पर ध्यान देना ही स्थूल ध्यान है। इस ध्यान में कल्पना का महत्व (importance of thoughts) है।

2.ज्योतिर्ध्यान- मूलाधार और लिंगमूल के मध्य स्थान में कुंडलिनी सर्पाकार में स्थित है। इस स्थान पर ज्योतिरूप ब्रह्म का ध्यान करना ही ज्योतिर्ध्यान है।

3.सूक्ष्म ध्यान- साधक सांभवी मुद्रा का अनुष्ठान करते हुए कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

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