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मंगलवार व्रत कथा | Bhagwan Shri Hanuman ji ki Mangalvar vrat katha




मंगलवार व्रत कथा | Bhagwan Shri Hanuman ji ki Mangalvar vrat katha

सर्व सुख, रक्त विकार, राज्य सम्मान तथा पुत्र की प्राप्ति के लिए मंगलवार का वर्त उतम है|

विधि:

सर्व सुख, रक्त विकार, राज्य सम्मान तथा पुत्र की प्राप्ति के लिए मंगलवार (tuesday) का वर्त उतम है|
इस वर्त में गेहू और गुड का ही भोजन करना चाहिए|
भोजन दिन रात में एक बार ही ग्रहण करना चाहिए|
वर्त २१ हफ्तों तक रखे|
इस वर्त से मनुष्य (human) के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं|
वर्त के पूजन के समय लाल पुष्पों को चडावे और लाल वस्त्र धरण (wear red clothes) करे|
अंत में हनुमान जी (shri hanuman ji) की पूजा करनी चाहिए तथा मंगलवार की कथा सुननी चाहिए|

 आरती:

आरती कीजै हनुमान लला की |
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

जाके बल से गिरवर कांपे |
रोग दोष जाके निकट न झांके ||

अंजनी पुत्र महा बलदाई |
सन्तन के प्रभु सदा सुहाई ||

दै बीड़ा रघुनाथ पठाये |
लंका जारि सिय सुधि लाये ||

लंका सी कोट समुद्र सी खाई |
जात पवनसुत बार ना लाई ||

लंका जारि असुर संहारे |
सिया राम के काज संवारे ||

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे |
लाये संजीवन प्राण उबारे ||

पैठि पाताल तोरि यम कारे |
अहिरावन की भुजा उखारे ||

बाये भुजा असुर संहारे |
दाहिने भुजा संत जन तारे ||

सुर नर मुनि आरती उतारे |
जै जै जै हनुमान उचारें ||

कंचन थार कपूर जलाई |
आरति करत अंजना माई ||

जो हनुमान जी की आरती गावै |
बसि बैकुंठ परमपद पावै ||

 

मंगलवार व्रतकथा:

ऋषिनगर में केशवदत्त ब्राह्मण अपनी पत्नी अंजलि के साथ रहता था। केशवदत्त के घर में धन-संपत्ति की कोई कमी नहीं थी। नगर में सभी केशवदत्त का सम्मान करते थे, लेकिन केशवदत्त संतान (child) नहीं होने से बहुत चिंतित रहता था।

दोनों पति-पत्नी प्रति मंगलवार को मंदिर में जाकर हनुमानजी की पूजा करते थे। विधिवत मंगलवार का व्रत करते हुए कई वर्ष (so many years) बीत गए। ब्राह्मण बहुत निराश (sad) हो गया, लेकिन उसने व्रत करना नहीं छोड़ा।

कुछ दिनों के बाद केशवदत्त हनुमानजी की पूजा करने के लिए जंगल (jungle/forest) में चला गया। उसकी पत्नी अंजलि घर में रहकर मंगलवार का व्रत करने लगी। दोनों पति-पत्नी पुत्र-प्राप्ति के लिए मंगलवार का विधिवत व्रत करने लगे। कुछ दिनों बाद अंजलि ने अगले मंगलवार को व्रत किया लेकिन किसी कारणवश उस दिन अंजलि हनुमानजी को भोग नहीं लगा सकी और उस दिन वह सूर्यास्त के बाद भूखी ही सो गई।

अगले मंगलवार को हनुमानजी को भोग लगाए बिना उसने भोजन नहीं करने का प्रण कर लिया। छः दिन तक अंजलि भूखी-प्यासी रही। सातवें दिन मंगलवार को अंजलि ने हनुमानजी की पूजा की, लेकिन तभी भूख-प्यास के कारण अंजलि बेहोश हो गई।

हनुमानजी ने उसे स्वप्न (dream) में दर्शन देते हुए कहा- ‘उठो पुत्री! मैं तुम्हारी पूजा-पाठ से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें सुंदर और सुयोग्य पुत्र होने का वर देता हूँ।’ यह कहकर हनुमानजी अंतर्धान हो गए। तत्काल अंजलि ने उठकर हनुमानजी को भोग लगाया और स्वयं भोजन किया।

हनुमानजी की अनुकम्पा से अंजलि ने एक सुंदर शिशु (beautiful son) को जन्म दिया। मंगलवार को जन्म लेने के कारण उस बच्चे का नाम मंगलप्रसाद रखा गया। कुछ दिनों बाद अंजलि का पति केशवदत्त भी घर लौट आया। उसने मंगल को देखा तो अंजलि से पूछा- ‘यह सुंदर बच्चा किसका है?’ अंजलि ने खुश होते हुए हनुमानजी के दर्शन देने और पुत्र प्राप्त होने का वरदान देने की सारी कथा सुना दी। लेकिन केशवदत्त को उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसके मन में पता नहीं कैसे यह कलुषित विचार आ गया कि अंजलि ने उसके साथ विश्वासघात किया है। अपने पापों को छिपाने के लिए अंजलि झूठ (lying) बोल रही है।

केशवदत्त ने उस बच्चे को मार डालने की योजना बनाई। एक दिन केशवदत स्नान के लिए कुएँ (well) पर गया। मंगल भी उसके साथ था। केशवदत्त ने मौका देखकर मंगल को कुएँ में फेंक दिया और घर आकर बहाना बना दिया कि मंगल तो कुएँ पर मेरे पास पहुँचा ही नहीं। केशवदत्त के इतने कहने के ठीक बाद मंगल दौड़ता हुआ घर लौट आया।

केशवदत्त मंगल को देखकर बुरी तरह हैरान हो उठा। उसी रात हनुमानजी ने केशवदत्त को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा- ‘तुम दोनों के मंगलवार के व्रत करने से प्रसन्न होकर, पुत्रजन्म का वर मैंने दिया था। फिर तुम अपनी पत्नी को कुलटा क्यों समझते हो!’

उसी समय केशवदत्त ने अंजलि को जगाकर उससे क्षमा माँगते (feeling sorry) हुए स्वप्न में हनुमानजी के दर्शन देने की सारी कहानी सुनाई। केशवदत्त ने अपने बेटे को हृदय से लगाकर बहुत प्यार किया। उस दिन के बाद सभी आनंदपूर्वक रहने लगे।

मंगलवार का विधिवत व्रत करने से केशवदत्त और उनके सभी कष्ट (problems) दूर हो गए। इस तरह जो स्त्री-पुरुष विधिवत मंगलवार का व्रत करके व्रतकथा सुनते हैं, हनुमानजी उनके सभी कष्ट दूर करके घर में धन-संपत्ति का भंडार भर देते हैं। शरीर के सभी रक्त विकार के रोग भी नष्ट हो जाते हैं।

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